बच्चों आओ, बाघ बचाओ!

Posted by: vivek ranjan shrivastava on

व्यंग

बच्चों आओ, बाघ बचाओ!

- विवेक रंजन श्रीवास्तव

ओबी- 11 एमपीईबी कालोनी

रामपुर जबलपुर

9425806252

‘बच्चों आओ, बाघ बचाओ‘ सुनकर चैकियेगा नहीं यह अपील मैं उसी महान परम्परा का निर्वहन करते हुये, कर रहा हूं, जिसके अनुसार हम हर संकट का समाधान , हर समस्या का निदान, स्कूलों में ढूंढते आये है। धरती का जल स्तर गिर रहा हो, पल्स पोलियो अभियान हो, आयोडीन नमक के लिये जनजाग्रति करनी हो, सर्वशिक्षा अभियान चलाना हो, या उपभोक्ता अधिकारों को लेकर कोई आंदोलन चलाना हो तो भी , मतलब हर कार्यक्रम की सफलता के लिये बच्चों की रैली, बच्चों के द्वारा निबंध लेखन, बच्चों की चित्रकला या कहानी प्रतियोगिता का आयोजन करना हमारी परम्परा है। बिजली बचाने की मुहिम हो, या पालीथिन के खिलाफ आंदोलन, यहां तक कि एड्स के विरोध में और परिवार नियोजन के प्रचार तक के लिये बच्चों की रैली निकलते हुये, हम आप देखते ही है। बच्चे, कल के विशव की धरोहर हैं, उन्हें सीख देकर हम सरलता से अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर पाते है। स्कूलो में बच्चे एक साथ मिल जाते है। भीड जुट जाती है,अखबारो में मुख्य अतिथि का मुस्कराता फोटो छप जाता है , आयोजन सफल और सुसंपन्न हो जाता है।

प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हर विपत्ति में , हर समस्या के निदान में स्कूलों का योगदान महत्वपूर्ण है। चुनाव होने हों तो स्कूलो में चुनाव केन्द्र बन जाता है, मास्साब की ड्यूटी चुनाव करवाने से लेकर जनगणना तक में लगाकर ये राष्ट्रीय कार्यक्रम संपन्न किये जाते है। बाढ़ आ जाये तो स्कूल, बाढ़ पीड़ितो की शरण स्थली में बदल जाता है। भूकम्प पीड़ीत लोगों या सैनिको की सहायता के लिये राशि एकत्रित करनी हो , तो भी हमारे बच्चे चंदा देकर अग्रणी भूमिका का निर्वाह करते हैं । अर्थात प्रत्येक राष्ट्रीय घटना में स्कूलों और बच्चों की अहॅं भूमिका निर्विवाद है। अतः आज जब देश में ‘बाघ‘ संकट में है,केवल १४११ बाघ बचे हैं आज भारत भूमि में , तो इस परिप्रेक्ष्य में मेरी यह अपील कि ‘बच्चों आओ-बाघ बचाओ‘ मायने रखती है।

वैसे बाघ माँ दुर्गा का वाहन है। और बाघो की कमी यह प्रदर्शित करती है कि माँ दुर्गा अपने वाहन का माडल बदलने के चक्कर में है। एंटीक, विंटेज कारों का महत्व हम सब समझते हैं । सो बाघ का महत्व निर्विवाद है। बाघों को डायनासौर की तरह विलुप्त होने से बचाने के लिये हमारे बच्चों को तो आगे आना ही होगा। हम सब भी कुछ कर सकें, तो बेहतर होगा वरना बाघ भी केवल डाक टिकटो में नजर आया करेंगे या सजिल्द पुस्तको में कैद होकर रह जायेंगे । इस दिशा में अमिताभ जी ने तो अपना फर्ज बहुत पहले ही निभा दिया है, उन्होने स्वंय अपनी आवाज में, एक गाना भी गाया है, और उस पर अभिनय भी किया है, जिसमें वे एक बच्चे को कहानी सुनाते हैं कि, किस तरह एक बाघ ने उन्हें मारकर खा लिया, और बच्चा हॅंस पड़ता है। अब हमारी बारी है , हम सब को कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा , अन्यथा ढ़ूढ़ते रह जाओगे . बाघ हमारी संस्कृति में रचा बसा है , लोकसंस्कृति में बाघ नृत्य करते लोकनर्तक हमारी इसी भावना का प्रदर्शन करते हैं . दरअसल जब बाघ को रहने के लिये जंगल न होगा, खाने के लिये दूसरे जानवर न होंगे तो, भले ही वह जंगल का राजा कहलाये पर संकट में तो आ ही जायेगा। वह आत्मरक्षा में संघर्ष करेगा, और हमें खायेगा। ये और बात है कि चतुर मानव की वह घटिया प्रजाति, जिसे शेर के चमड़े का व्यापार करना होता है, और शेर के दाँत और नाखून बेचकर रूपये बनाने होते है, वह जरूर शेर का शिकार करने से नहीं चूक रही, उन शिकारियों और वन्य पशुओ के तस्करों पर नियंत्रण करने वाले जंगल मुहकमे के बड़े अमले को जो जागते हुये सो रहा है उसे जगाओं, मेरे बच्चो ! शोर मचाओं,चिल्लाओ बाघ बचाओं। कभी हम बाघ से बचते थे आज समय आया है जब हमें बाघ बचाने का बीड़ा उठाना जरूरी है .

बच्चों आओ बाघ के चित्र बनाओ, बाघ पर गीत रचो, कहानियां लिखो, अपने-अपने माता-पिता, तक बाघों की घटती संख्या की चिंता का संदेश पहुंचाओ। क्योकि बाघ हैं तो जंगल का विसाल साम्राज्य है , जंगल हैं तो हम तुम हैं , अतः स्वयं हमारे लिये जरूरी है कि बाघ बचाओ अभियान सफल हो । मेरा विश्वास है बच्चों कि, तुम अपने अभियान में जरूर सफल होगे और जल्दी ही बाघो की संख्या १४११ से बढ़कर ४१११ हो जायेगी , केवल सरकारी आंकड़ो में नही , वरन सचमुच जंगलों में । मेरी शुभकामनायें तुम्हारे साथ है।

लेखक के व्यंग संग्रह "रामभरोसे" तथा "कौआ कान ले गया" पुस्तकाकार प्रकाशित हैं , जिन्हें राष्ट्रीय पुरुस्कार मिल चुके हैं .